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Saturday, December 17, 2011

उम्मीद




हर वक़्त निगाहें टिकी रहती है आसमान पर
काश वोह आसमान मेरे पिंजरे में आ जाए


हर वक़्त खोया रहता हूँ वोह बचपन की यादों में
काश वोह खुशहाल  बचपन वापस मेरी ज़िन्दगीमें आ जाए


हर वक़्त सर रखता हूँ मरहूम तेरी कबर पर
काश तेरे बेजान जिस्म में वापस जान आ जाए


क्यूँ नहीं? आखिर सूरज और चाँद ने भी तो मनमानी की है!
उसने भी तो आसमान से अपनी दीवार और छत बनाई है!


क्यूँ नहीं? बारिश की वोह बूँद ने भी तो
सूरज की किरण को चूमकर बादलको गले लगाया है!


क्यूँ नहीं? सूरज भी तो सारी रात रूठकर
सुबह मुस्कुराता हुआ वापस आता है?


क्यूँ नहीं? केहते है मांगो तो खुदा भी मिल जाता है
तो फिर मरहूम की जान कौनसी बड़ी बात है?
- Musten Jiruwala

9 comments:

Sangeeta said...

Excellent line....

Musten said...

Thank you, Sangeeta :)

The Learner.... said...

It is very nice and touching.. Musten :)

keep writing n sharing...

amit's words said...

Bahut badhiya bhai !

Kaizer said...

Great stuff!! Really liked it!

tasneem rangwala said...

Lovely .... great writing..:)

Musten said...

Thank you so much, Tasneem, Kaizer, Amit, Smriti :)

Adee said...

shayad isliye kyunki jo jakar bhi yaadon mein rehta hai, wo kabhi gaya hi nahi hota hai :) bohat accha likha aapne -adee

Musten said...

Thank you, Adee :)